Saturday, 9 April 2016

डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी की रहस्मयी मौत की जांच के लिए कोई कमिटी क्यों नही ?



डॉ श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की रहस्मयी मौत के तुरंत पश्चात् उस समय के तात्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने नम-नेत्रों से डॉ मुख़र्जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि, “ अपने सार्वजनिक जीवन में वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को एवं अपनी अंदरूनी प्रतिबद्धताओं को व्यक्त करने में कभी डरते नही थे. ख़ामोशी में कठोरतम झूठ बोले जाते हैं. जब बड़ी गलतियाँ की जाती हैं तब इस उम्मीद में चुप रहना अपराध है कि एक-न-एक दिन कोई सच बोलेगा.”

विडम्बना यह है कि तात्कालीन सत्ता के खिलाफ जाकर सच बोलने की जुर्रत करने वाले डॉ मुखर्जी को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, और उससे भी बड़ी विडम्बना की बात ये है कि आज भी देश की जनता उनकी रहस्यमयी मौत के पीछे की सच को जान पाने में नाकामयाब रही है. डॉ मुखर्जी इस प्रण पर सदैव अडिग रहे कि जम्मू एवं कश्मीर भारत का एक अविभाज्य अंग है. उन्होंने सिंह-गर्जना करते हुए कहा था कि, “एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नही चलेगा- नही चलेगा”.

उस समय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान किया गया था कि कोई भी भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू व कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता. डॉ मुखर्जी इस प्रावधान के सख्त खिलाफ थे. उनका कहना था कि, “नेहरु जी ने ही ये बार-बार ऐलान किया है कि जम्मू व कश्मीर राज्य का भारत में 100% विलय हो चूका है. फिर भी यह देखकर हैरानी होती है कि इस राज्य में कोई भारत सरकार से परमिट लिए बिना दाखिल नही हो सकता. मैं नही समझता कि भारत सरकार को यह हक़ है कि वह किसी को भी भारतीय संघ के किसी हिस्से में जाने से रोक सके क्योंकि खुद नेहरु ऐसा कहते हैं कि इस संघ में जम्मू व कश्मीर भी शामिल है.”

उन्होंने इस प्रावधान के विरोध में भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू व कश्मीर जाने की योजना बनायीं. इसके साथ ही उनका अन्य मकसद था वहां के वर्तमान हालात से स्वयं को वाकिफ कराना क्योंकि जम्मू व कश्मीर के तात्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला की सरकार ने वहां के सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बाद दुसरे सबसे बड़े स्थानीय भाषाई डोगरा समुदाय के लोगों पर असहनीय जुल्म ढाना शुरू कर दिया था. नेशनल कांफ्रेंस का डोगरा-विरोधी उत्पीड़न वर्ष 1952 के शुरूआती दौर में अपने चरम पर पहुँच गया था. डोगरा समुदाय के आदर्श पंडित प्रेमनाथ डोगरा ने बलराज मधोक के साथ मिलकर ‘जम्मू व कश्मीर प्रजा परिषद् पार्टी’ की स्थापना की थी. इस पार्टी ने डोगरा अधिकारों के अलावा जम्मू व कश्मीर राज्य का भारत संघ में पूर्ण विलय की लड़ाई, बिना रुके, बिना थके लड़ी. इस कारन से डोगरा समुदाय के लोग शेख अब्दुल्ला को फूटी आँख भी नही सुहाते थे. शेख अब्दुल्ला के दिमाग में जो योजनायें थीं, उनके मुताबिक जम्मू व कश्मीर को एक स्वतंत्र राज्य बनाया जा सकता था, जिसका अपना संविधान, राष्ट्रीय विधानसभा, सुप्रीम कोर्ट और झंडा होगा. प्रजा परिषद् के नेताओं ने किसी तरह उस संविधान के प्रारूप की कॉपी हासिल कर ली जिसके कारन भी वे शेख अब्दुल्ला की नजरो में चढ़ गए. उस समय के तात्कालीन इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख बीएन मलिक ने अपनी किताब ‘माई इयर्स विद नेहरु: कश्मीर’ में लिखा है कि शेख अब्दुल्ला चाहते थे कि सारे डोगरा कश्मीर छोड़कर भारत चले जाएँ, और अपनी जमीन उनलोगों के लिए छोड़ दें, जिन्हें शेख अब्दुल्ला प्राणपन से चाहते थे.

डॉ मुखर्जी बिना परमिट लिए हुए ही 8 मई, 1953 को सुबह 6:30 बजे दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में अपने समर्थकों के साथ सवार होकर पंजाब के रास्ते जम्मू के लिए निकले. उनके साथ बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त वैध और कुछ पत्रकार भी थे. रास्तें में हर जगह डॉ मुखर्जी की एक झलक पाने एवं उनका अविवादन करने के लिए लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ता था. डॉ मुखर्जी ने जालंधर के बाद बलराज मधोक को वापस भेज दिया और अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ी. ट्रेन में एक बुजुर्ग व्यक्ती ने गुरदासपुर (जिला, जिसमे पठानकोट आता है) के डिप्टी कमिश्नर के तौर पर अपनी पहचान बताई और कहा कि ‘पंजाब सरकार ने फैसला किया है कि आपको पठानकोट न पहुँचने दिया जाए. मैं अपनी सरकार से निर्देश का इंतज़ार कर रहा हूँ कि आपको कहाँ गिरफ्तार किया जाए.’ हैरत की बात यह निकली कि उन्हें गिरफ्तार नही किया गया, न तो अमृतसर में, न पठानकोट में और न ही रास्ते में कहीं और. अमृतसर स्टेशन पर करीब 20000 लोग डॉ मुख़र्जी के स्वागत के लिए मौजूद थे.

पठानकोट पहुँचने के तुरंत बाद गुरदासपुर के डिप्टी कमिश्नर, जो उनका पीछा कर रहे थे, ने उनसे मिलने की इजाजत मांगी. उन्होंने डॉ मुखर्जी को बताया कि उनकी सरकार ने उन्हें निर्देश दिया है कि वे उन्हें और उनके सहयोगियों को आगे बढ़ने दें और बिना परमिट के जम्मू व कश्मीर में प्रवेश करने दें. उस अफसर को खुद हैरानी हो रही थी कि उसे जो आदेश मिलने वाले थे, वे पलट कैसे दिए गए! उसे तथा वहां मौजूद अन्य किसी को भी इस साजिश की जरा भी भनक नही थी जिसके अनुसार डॉ मुखर्जी को जम्मू व कश्मीर में गिरफ्तार किये जाने की योजना बन चुकी थी ताकि वे भारतीय सर्वोच्च न्यायलय के अधिकार-क्षेत्र से बाहर पहुँच जाएँ.

उनका अगला ठहराव रावी नदी पर बसे माधोपुर की सीमा के पास चेकपोस्ट था. रावी पंजाब की पांच महान नदियों में से एक थी, जो पंजाब और जम्मू व कश्मीर की सीमा बनाते हुए बीच से बहती थी. नदी के आर-पार जाने के लिए सड़कवाला एक पुल था, और राज्यों की सरहद इस पुल के बीचोंबीच थी. जैसे ही डॉ मुखर्जी की जीप ब्रिज के बीच में पहुंची, उन्होंने देखा की जम्मू व कश्मीर पुलिस के जवानों का दस्ता सड़क के बीच में खड़ा है. जीप रुकी और तब एक पुलिस अफसर, जिसने बताया कि वह कठुआ का पुलिस अधीक्षक है, उसने राज्य के मुख्या सचिव का 10 मई, 1953 का एक आदेश सौपा, जिसमे राज्य में उनके प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगाया गया था.
“लेकिन मैं जम्मू जाना चाहता हूँ !” डॉ मुखर्जी ने कहा.

इसके बाद उस पुलिस अफसर ने गिरफ्तारी का आदेश अपनी जेब से निकाला, जो पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत जारी किया गया था और जिस पर जम्मू व कश्मीर के पुलिस महानिरीक्षक पृथ्वीनंदन सिंह का 10 मई का दस्तखत था, जिसमे कहा गया था डॉ मुखर्जी ने ऐसी गतिविधि की है, कर रहे हैं या करनेवाले हैं, जो सार्वजनिक सुरक्षा एवं शांति के खिलाफ है, अतः उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया जाता है. प्रश्न यह उठता है कि यदि उनकी तथाकथित गतिविधियों से सार्वजनिक  सुरक्षा एवं शांति को इतना ही बड़ा खतरा था तो उन्हें जम्मू व कश्मीर के सीमा में प्रवेश करने से पहले ही क्यों नही गिरफ्तार किया गया जैसा कि गुरदासपुर के डिप्टी कमिश्नर ने डॉ मुखर्जी को इस बारे में बताया था? उन्हें पठानकोट या उससे पहले ही गिरफ्तार किये जाने की योजना क्यों बदल दी गयी? उन्हें आगे बढ़ने ही क्यों दिया गया ? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो आज भी अनुत्तरित हैं.

डॉ मुखर्जी को जिस जगह बंदी बनाया गया था, वह वाकई एक बहुत छोटा सा मकान था, जिसके आसपास कुछ भी नही था- निशात बाग़ के करीब, लेकिन श्रीनगर शहर से काफी दूर, जिसे एक उपजेल बना दिया गया था. इस मकान तक पहुँचने के लिए खड़ी सीढियाँ चढ़नी पड़ती थीं, खासकर उनके ख़राब पैर की वजह से यह और भी मुश्किल हो जाता होगा. इस मकान का सबसे बड़ा कमरा दस फीट लम्बा और ग्यारह फीट चौड़ा था, जिसमे डॉ मुखर्जी को बंदी बनाया गया था. वहीँ किनारे के दो छोटे-छोटे कमरों में उनके साथ बंद गुरुदत्त वैध और टेकचंद को रखा गया था. शहर से कोई डॉक्टर तभी आ सकता था, जब उसे विशेष रूप से बुलाया जाता. बांगला भाषा में लिखी गयी उनकी द्वारा चिठियों की विशेष अनुवादक द्वारा जांच करायी जाती थी. शेख अब्दुल्ला ने यह आदेश दे रखा था कि डॉ मुखर्जी को कोई अतिरिक्त सहूलियत तब-तक न दी जाए, जब तक वे खुद आदेश न दें. जेल में रहने के दौरान उनके किसी भी दोस्त या रिश्तेदार को उनसे मिलने नही दिया गया, यहाँ तक की उनके बड़े बेटे अनुतोष की अर्जी भी ठुकड़ा दी गयी. वह जेल में प्रतिदिन डायरी लिखा करते थे जो कि उनके बारे में जानकारी का एक अच्छा स्त्रोत हो सकता था परन्तु शेख अब्दुल्ला की सरकार ने उनकी मौत के बाद उस डायरी को जब्त कर लिया और बार-बार गुजारिश के बावजूद भी अभी तक लौटाया नही गया है. 24 मई को पंडित नेहरु और डॉ कैलाशनाथ काटजू आराम करने श्रीनगर पहुंचे पर उनलोगों ने डॉ मुखर्जी से मुलाक़ात कर उनका कुशलक्षेम पूछना भी उचित नही समझा.

22 जून की सुबह उनकी तबियत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गयी. जेल अधीक्षक को सूचित किया गया. काफी विलम्ब से वह एक टैक्सी (एम्बुलेंस नही) लेकर पहुंचे और वह डॉ मुखर्जी को उस नाज़ुक हालात में भी उनके बेड से चलवाकर टैक्सी तक ले गए. उनके बाकी दो साथियों को उनके साथ उनकी देखभाल करने के लिए अस्पताल जाने की इजाजत नही दी गयी. उन्हें कोई निजी नर्सिंग होम में नही बल्कि राजकीय अस्पताल के स्त्री प्रसूति वार्ड में भरती कराया गया. एक नर्स जो कि डॉ मुखर्जी के जीवन के अंतिम दिन उनकी सेवा में तैनात थी, ने डॉ मुखर्जी की बड़ी बेटी सविता और उनके पति निशीथ को काफी आरजू-मिन्नत के बाद श्रीनगर में एक गुप्त मुलाकात के दौरान यह बताया था कि उसी ने डॉ मुखर्जी को वहां के डॉक्टर के कहने पर आखिरी इंजेक्शन दिया था. उसने बताया कि जब डॉ मुखर्जी सो रहे थे तो डॉक्टर जाते-जाते यह बता कर गया कि, ‘डॉ मुखर्जी जागें तो उन्हें इंजेक्शन दे दिया जाए और उसके लिए उसने एम्प्यूल नर्स के पास छोड़ दिया.’ कुछ देर बाद जब डॉ मुख़र्जी जगे तो उस नर्स ने उन्हें वह इंजेक्शन दे दिया. नर्स के अनुसार जैसे ही उसने इंजेक्शन दिया डॉ मुखर्जी उछल पड़े और पूरी ताकत से चीखे, ‘जल जाता है, हमको जल रहा है.’ नर्स टेलेफोन की तरफ दौरी ताकि डॉक्टर से कुछ सलाह ले सके परन्तु तब तक वह मूर्छित हो चुके थे और शायद सदा के लिए मौत की नींद सो चुके थे. पंडित नेहरु जो डॉ मुखर्जी की मृत्यु के दौरान लन्दन में ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ II की ताजपोशी में हिस्सा ले रहे थे, ने बॉम्बे एअरपोर्ट पर उतरने के पश्चात भी इस त्रासदी पर कुछ भी नही बोले जिसने उनकी अनुपस्थिति में पुरे देश को स्तब्ध कर दिया था.

डॉ मुखर्जी की मां जोगमाया देवी ने नेहरु के 30 जून, 1953 के शोक सन्देश का 4 जुलाई को उत्तर देते हुए पत्र लिखा जिसमें उन्होंने उनके बेटे की रहस्मयी परिस्थितियों में हुई मौत की जाँच की मांग की. जवाब में पंडित नेहरु ने बड़ी मीठी-मीठी बातें लिखीं, दुखियारी माँ के लिए आकंठ करुणा की अभिव्यक्ति की; परन्तु जांच की मांग को ख़ारिज कर दिया. उन्होंने जवाब देते हुए यह लिखा कि, “मैंने कई लोगों से इस बारे में मालूमात हासिल किये हैं, जो इस बारे में काफी कुछ जानते थे. मैं आपको सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि मैं एक स्पष्ट और इमानदार नतीजे पर पहुँच चूका हूँ कि इसमें कोई रहस्य नही है और डॉ मुखर्जी का पूरा ख्याल रखा गया था.”

यहाँ सबसे बड़ा विचारनीय प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि आखिर पंडित नेहरु ने जांच की मांग को ख़ारिज क्यों कर दिया ? क्या उन्हें नैतिक, राजनैतिक या संवैधानिक किसी भी अधिकार के तहत इस प्रकार का फैसला सुनाने का हक था ? क्या कोई गुप्त बात थी अथवा इस घटना के पीछे कोई साजिश थी जिसके जांचोपरांत बाहर आ जाने का डर था ? ये सारे प्रश्न इसलिए प्रासंगिक हो जाते हैं क्योंकि जब कभी भी एक मशहूर शख्शियत की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती है, अथवा वह गायब होता है, तब एक जांच जरुर होती है. इस तरह के कम से कम तीन कमीशन नेताजी सुभाषचंद्र बोस के गायब होने की जांच करने के लिए बनाये गए. ये कमीशन थे – शाहनवाज़ कमीशन (1956), जीडी खोसला कमीशन (1970) और मनोज मुकर्जी कमीशन(1999). महात्मा गाँधी की हत्या की जांच कपूर कमीशन ने, इंदिरा गाँधी कि हत्या की जांच ठक्कर कमीशन ने और राजीव गाँधी की हत्या की दो कमीशन जेएस वर्मा कमीशन और एमसी जैन कमीशन ने जांच की. यहाँ यह गौरतलब है कि ये सभी हत्याकांड (नेताजी के गायब होने को छोड़कर) सबके आँखों के सामने हुए; फिर भी कातिलों की पृष्ठभूमि और साजिश का पता लगाने के लिए जांच की गयी. परन्तु डॉ मुखर्जी की अकाल मौत रहस्मयी परिस्थितियों में एक गुप्त जगह में, परिवार और दोस्तों से दूर, एक शत्रुतापूर्ण क्षेत्र में हुई, जहाँ भारत के सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र तक नही था, बावजूद इसके आजतक इस घटना की औपचारिकता मात्र के लिए भी एक जांच नहीं हुई है. क्या यह डॉ मुखर्जी एवं उनके परिवार के साथ-साथ पुरे देश के साथ एक सरासर धोखा नही है ? क्या देश की जनता को यह जानने का हक नही है कि उसके प्रिय नेता की मौत के पीछे का जिम्मेदार कारक कौन था ? कम से कम अभी की वर्तमान सरकार को चाहिए कि इस मामले में एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच समिति का गठन करे और जनता के समक्ष सच्चाई लाने का प्रयास करे क्योंकि यदि यह अभी नही होगी तो फिर कभी नही होगी.


लेखकगन:
1.   रोहित कुमार (चतुर्थवर्षीय विधि छात्र, कीट लॉ स्कूल भुबनेश्वर, ओडिशा)
2.   प्रोफेसर प्रत्युष कुमार (विधि-शिक्षक, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली)

नोट 1: प्रोफेसर प्रत्युष कुमार रिश्ते में कमला सिन्हा के नाती लगते हैं, जो आई के गुजराल के प्रधानमंत्रित्व काल में विदेश राज्य मंत्री थीं. कमला सिन्हा रिश्ते में डॉ मुख़र्जी की नतिनी लगती थीं. अतः, इस आर्टिकल के सह-लेखक प्रोफेसर प्रत्युष कुमार डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के वंशज हैं.

नोट 2: उपरोक्त आर्टिकल के लिए सारे तथ्य वर्तमान में त्रिपुरा राज्य के राज्यपाल श्री तथागत रॉय की लिखी हुई किताब “अप्रतिम नायक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी” प्रभात प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2013 से ली गयी है.

For More Details about co-author Pratyush Kumar:
1.     

Profile of Late Kamla Sinha: https://en.wikipedia.org/wiki/Kamala_Sinha
   


  




Thursday, 7 April 2016

‘Mysterious’ but a ‘Possible Political assassination’ of Dr. Shyama Prasad Mookerjee?





The then Vice President of India and a great scholar Dr. Sarvapalli Radhakrishnan, immediately after the appalling custodial death of Dr. Shyama Prasad Mookerjee who was very close to him, had penned down in his painful misty-eyed words about his charismatic and magnetic personality. He said, “He did never fear to express his Conscience throughout his public career. The blatant lies are uttered in silence. If the huge injustice takes place somewhere then to be reticent on it in the expectation that someone shall speak the truth someday, is a great sin committed on the part of a human being. Each one of us must put out the truth fearlessly in a democratic society”. The irony is that the one who dared to revolt for truth and his conviction to make whole J&K, a part of our great nation like other states, was made to sacrifice through his life by some dubious secularist fascists masquerading as a democratic darling. The consequence is the nation’s eyes are still lingering for truth to come out behind his ‘Mysterious’ but ‘Possible Political assassination’.

One may wonder as to why we have deliberately used the paraphrase ‘Mysterious but Possible Political assassination’ even though nothing is judicially established as of now? The reasons are too simple to be astonished. ‘Mysterious,’ because even after passing of 63 years of the occurrence of his death, it continues to remain an enigma as to the nature, identity and role of the catalysts behind his sudden demise in custody of a Government outside the jurisdiction of the Supreme Court of India, and the even greater mystery is why the then Central Government in power didn’t constitute a commission of Inquiry or any such body to look into the nightmarish death of one of India’s greatest leaders. The Government’s complete unwillingness and lack of cooperation at that time to constitute an inquiry into the matter to find out the real cause of his death even after repeated requests from the mother of the deceased and numerous celebrated personalities, makes it even more mysterious and indicates a possible existence of criminal intent in the entire scenario.

For the explanation of the second part ‘Possible Political assassination’ there are numerous factual records to reach such a conclusion. In case of the occurrence of any mysterious death the first aspect which any investigating agency prefers to concentrate upon, is who may be the greatest beneficiary of such a death or who would have been more troubled, had the deceased been alive. The same principle applies to this case also and needless to say that the highest beneficiary of his death was none other than the then Prime Minister of India Jawaharlal Nehru and the then Prime Minister of Jammu and Kashmir, Sheikh Abdulla. It is a matter of record that Pt. Nehru and Shekh Abdulla had got extremely frustrated by the way Dr. Mookerjee was receiving enormous support from the people of the Country on the issue of entire J&K being an integral part of the nation like any other state. Dr. Mookerjee’s full-fledged support to ‘Jammu and Kashmir Praja Parishad Party’ formed and led by Pt. Premnath Dogra had instilled a sense of great anxiety and fear in Nehru’s mind. He had made Nehru extremely uncomfortable and had almost exposed him through his questions in Parliament dated 7th of August 1952 and on several other occasions inside and outside of Parliament. Mr. Nehru in one of his letters to Dr. Mookerjee had gone to the extent of threatening him in a subtle hint. He had written “If the movement continues then ‘we’ shall decide as to what actions the Government can take in this regard.” The pronoun ‘We’ used by him was indicative of how he was in complete cahoots and alliance with Mr Sheikh Abdulla. 

It is not an embellishment to note that Mr. Nehru had started sensing his titanic competitor in Dr. Mookerjee’s vibrant, dynamic and nationalistic personality. Tathagata Roy in his book ‘The Life and Times of Dr. Syamaprasad Mookerjee’ reveals an astounding fact in this connection through the reference to his personal interview with Balraj Madhok dated 28th of August 2008 in New Delhi.  As per Balraj Madhok, immediately after Dr. Mookerjee made his decision of visiting ‘J&K’ public, the noted freedom fighter Sucheta Kripalani came to meet him. She asked Dr. Mookerjee “You should not go to Jammu & Kashmir. Pt. Nehru will not let you come back.” To this he responded that he doesn’t have a personal animosity with Pt. Nehru. He added that he is fighting for a cause and why Pt. Nehru shall have a sense of personal hostility towards him? Sucheta Kriplani responded to these sincere and upright feelings of Dr. Mookerjee by saying that she knows Nehru better than him. She apprised him that Nehru considers him his prime competitor and he may try to eliminate him from the field by going to any possible extent.

Tathagata Roy had also interviewed Savita Banerjee, the eldest daughter of Dr. Mookerjee, on 24th of April 2010 in her Goregaon Flat of Pune and what she revealed during the conversation was indeed appalling. She said that on her secret trip to Srinagar with her husband Nishith they somehow managed to meet the nurse who was taking care of Dr. Mookerjee in his last moments. The nurse apprised the couple after lot of emotional entreaties that when Dr. Mookerjee went into sleep, she was directed by the hospital doctor to inject a specific injection after he wakes up. When Dr. Mookerjee woke up the nurse injected him the said injection and he immediately screamed with all his might ‘It burns, I am burning’. The nurse ran towards the telephone to inform the doctor but till then Dr. Mookerjee lost consciousness and perhaps was made to sleep forever. Needless to say that all these aforesaid indications candidly beckon of a deep political conspiracy in Dr. Mookerjee’s death. Though, on the other hand some may argue that these facts are not substantiated by any positive evidence and thus this would not be fair and reasonable to point finger upon someone, we would like to humbly submit our counter to this prospective counter that “Absence of Evidence is Never Evidence of absence.”

The former Prime Minster of India, Shri Atal Bihari Vajpayee had openly said in 2004 that Dr. Mukherjee’s death was the result of Nehru’s conspiracy. Dr. Mookerjee was intentionally arrested in Jammu and Kashmir, so as to take him out from the jurisdiction of the Supreme Court of India. He was confined in a straitened detention-centre near Nishat garden but it was at a considerable distance from the main town of Srinagar. The doctors could only come on a special invitation or request. The biggest room of this straitened detention centre was 10fit long and 11 fit wide in which Dr. Mookerjee was locked up with his other two colleagues Gurudatt Vaidh and Tekchand. Sheikh Abdullah had issued special directions that no special treatment shall be given to Dr. Mookerjee without his prior approval. On 24th of May 1953, Jawaharlal Nehru and Kailashnath Katju arrived in Srinagar for holidaying and they didn’t have the slightest courtesy to meet Dr. Mookerjee and see in what conditions he was made to spend his days. Dr. Mookerjee’s health started seriously deteriorating in the morning of 22nd June 1953. The Jail Supritendented was apprised of the situation and he came up with a Taxi (not ambulance) to get him admitted in a hospital. Even in that critical condition, he was made to cover the distance between his bed and the taxi on his feet. He was admitted in the ladies department of the Government hospital where only one nurse was there to look after him. Later on what happened is just an imperceptible history as this was the very place where a long-awaiting conspiracy was turned into action to achieve the desired outcome. Dr. Mookerjee was no more on 23rd of June 1953. Pt. Nehru who was outside India when this incident had occurred showed absolutely no sign of regret or grief even for the sake of social nicety after he landed on Bombay airport.

This has been a general precedent that whenever a celebrated personality from any field dies under mysterious circumstances, an inquiry commission is constituted, but this didn’t happen in case of Dr. Mookerjee’s death. Three commissions had been set up to find out the truth relating to Netaji Subhas Chandra Bose’s death. These commissions were – Shah Nawaz Commission (1956), G.D Khosla Commission (1970) and Manoj Mookerjee Commission (1999). Similarly, Kapoor Commission was constituted to look in to the Political assassination of Mahatma Gandhi; Thakkar Commission for Indira Gandhi and J.S Verma Commission and SC Jain Commission for Rajiv Gandhi’s killings. This is noteworthy that in all of these above cases (except Subhas Chandra Bose’s case) everyone knew about the respective killers yet the committees were constituted but no committee has been constituted hitherto to find out the truth behind Dr. Mookerjee’s death even though he died under completely mysterious circumstances within the border of a state upon which the Supreme Court of India had no jurisdiction. Is this not a great travesty of justice and a blatant discrimination in the first place? Does the citizenry have no right to know the reasons which led to the sudden demise of one of its beloved leaders? The mother of Dr. Shyama Prasad Mookerjee Jogmaya Devi, had written to Pt. Nehru to find out the real cause of his mysterious death. But Pt. Nehru dismissed her request by saying that he had gathered information from his personal source and did not find any mystery behind his death. He termed it a natural death. Nemo Judex In Causa Sua is an established principle of natural justice which means no one can be a judge in his own cause, but here Jawaharlal Nehru appears to be one.

Irrespective of political persuasion or political ideologies, justice should not alone be provided but also seem to be provided. And as the facts present themselves, the mysterious death of Dr. Syama Prasad Mookerjee in prison, in Kashmir, requires a relook. People must know what went into the sudden death of Dr. Mookerjee in prison while some other political leaders were busy holidaying completely oblivious of his health conditions and unconcerned about the well-being of one of the greatest personalities this sub-continent has produced. All the files related to Dr. Mukherjee needs to be known by the larger public, whether with the Central Government or State Government It also needs to be seen whether there are any files in the first place or not. If not, why not. And if yes, they should be made known to the wider public.

It is perfectly understandable to have reservations regarding the functioning of our police system and justice delivery mechanism. So, yes, even a person with dubious background like Yakub Menon deserves justice in a nation proud of its bearings. And, in that scenario, a great intellectual and political leader like, Dr. Syama Prasad Mookerjee surely deserves justice. It is quite possible that the culprits of his political killing might all be dead or too old and infirm but it needs to be known, who were they?

The entire intellectual, academic and media class of India has been silent on this for more than sixty years. It has never been widely debated or discussed. His name and contributions does not even appear in Indian history books. Even somebody like Jinnah, who created Pakistan, has been re-accommodated or at least discussed by academics, intellectuals and media persons whereas even the memory of Dr. Mukherjee has been wiped off the slate of Indian history. His death, like the death and killing of religious and ethnic minorities in Bangladesh, something which Dr. Mookerjee had intuitively sensed after the massacre of Hindus in Noakhali, goes largely unnoticed. It is high time that it is known. Let truth be known whatever it may be.


*(Dr. Mukherjee’s great-granddaughter, Dr. Gayatree Sharma, a journalist formerly working with the Times of India is ready with the petition for setting up of such an enquiry commission by the Government of India. She is going to take up the issue both with the Government of India and the President of India. When interviewed by the authors of this piece, she informed on how she will also rally all the existing members of the extended Mookerjee family on this issue.)  
*The factual narrative of this essay is drawn primarily from these two sources:
1. Tathagata Roy, Dr. Syama Prasad Mookerjee, Prabhat Prakashan, 2012.
2. Prashanto Kumar Chatterji, Dr. Syama Prasad Mookerjee and Indian Politics, Foundation Books, 2010.

By: Rohit Kumar (4th Year B.A.LL.B Student, School of Law, KIIT University, Bhubaneswar)
   

Saturday, 2 April 2016

Mrs. Kejriwal, Could You Please Persuade Your Husband to Bring 'AAP' under 'RTI' ?


Respected Ma’am,

I have decided to write this ‘Open Letter’ to you with an honest expectation in my heart that you shall certainly entertain my request which I am going to submit henceforth before you because by doing so it will certainly create a silver lining in the history of Indian Politics and a credit to you personally apart from enhancing your husband’s reputation. You may wonder as to why I have decided to submit my request to you rather than submitting it directly to your husband, the Chief Minister of the Govt. of NCT of Delhi. But, there are strong reasons behind it. These are as follows:
1.      
    The First reason is: though I have personally not submitted any such request to the Chief Minster himself but in the past many public spirited people and organizations including Chief Minister’s former allies have made numerous identical requests to the Chief Minister of Delhi but he has unfortunately paid no heed to their requests.

2.     


The Second reason is: recently the Government of NCT of Delhi headed by your husband has been writing letters to the wives of celebrated Bollywood actors like Ajay Devgan, Shahrukh Khan, Arbaaz Khan and Govinda requesting them to encourage their husbands to not endorse tobacco products as these contain cancer causing agents. This, in my view is indeed a wonderful idea and great step. So, this idea also struck me (for which again the ‘AAP Govt’ is solely responsible) that I should also submit my petition to you on people’s behalf with a request to persuade your husband. Madam, interestingly my petition is also pertaining to Cancer itself, though not ‘Bodily Cancer’ for which ‘AAP Govt’ wrote to the famous actors’ wives rather ‘Social Cancer’ for the elimination of which your husband had made a primary resolve and had to reluctantly enter into Party-politics by his own admission. Yes, that is the social ‘Cancer of Corruption’.

Madam, I am completely unaware of your affection/disaffection towards Politics, more particularly of your husband’s politics and therefore I seek apology in advance if I am unknowingly dragging you into this arena. But, this is indeed vital, madam, and it is inevitable for me to bring this issue to your gracious consideration. I hope you remember, even though you might not be interested in politics, the circumstances which forced your husband to join Party-Politics. It was primarily Janlokpal Act and inclusion of Political Parties within the purview of RTI Act. Janlokpal, though comparatively weak has already been passed by his Government but he has completely backtracked on the issue of bringing his Party under the purview of RTI Act. He has completely forgotten his promise to the people of this country. Madam, you must be aware about how vehemently he criticized other political parties for not willing to come under the purview of RTI and now he too is exactly doing the same. Is he not murdering the trust of people? Is he not dismantling the faith of citizenry? You know, whenever I think about this, I remember the story which I had read in class 6 titled ‘Haar ki Jeet’ related to ‘Baba Bharati and Khadag Singh’. I do not understand Politics deeply enough but perhaps it is the ‘Character of Power’ and the ‘Drugs of Chair’ which has the potential to change a man and his vision so drastically.

Madam, I had also joined the ‘AAM Admi Party’ only 2 months after its formal launching but recently decided to untie my knot with it after writing an ‘Open Letter’ to the Chief Minister for many reasons but this being the primary one. I do not believe that he is the same Arvind Kejriwal who with the help of RTIs fought in the ghettos of Delhi for the rights of the marginalized and now his office stonewalls my RTI petitions.

Madam, you may or may not believe but I had made a resolve to myself that if ‘AAP’ won elections in Delhi, I would undertake a pilgrimage to ‘Ma Vaishno Devi’s temple. I successfully undertook the pilgrimage after AAP made a clean-sweep in Delhi election. After that I returned to Delhi, where I tried to meet the Delhi CM personally for offering him the ‘Prasad’ which I had brought and kept for him with an extreme devotedness but after failing in my attempt to meet him I handed over a bag of ‘Prasad’ to his Car driver with a slip inside it pouring my affection in words. Hope, you must have got the bag of ‘Prasad’ from the Car driver. I have stated all this to prove my dedication to him and the cause he had espoused. But, now I feel deceived. I am continuously derided by my friends and family for my decision to join ‘AAP’ and this becomes an embarrassing situation for me.

So, now I would like to revert to the prime purpose of my letter-petition to you. This is, with all due humility, a personal request to you, to persuade your husband, the Chief Minister of Delhi, to bring his ‘Aam Admi Party’ under the purview of RTI so that a new example in the democratic history of India is set up when a Chief Minister after being persuaded by his wife, brought his Party under the domain of ‘RTI Act’. This shall also strengthen Peoples’ belief in women’s power, which will be a positive sign for democracy.

I hope you shall certainly entertain my petition on people’s behalf and will act accordingly in this regard. Hope to hear the ‘Good News’ soon.


Yours Sincerely

ROHIT KUMAR (Former Member of ‘AAP’)
4th Year B.A.LL.B Student,
School of Law, KIIT University,
Bhubaneswar, Odisha.


           




Thursday, 31 March 2016

क्रांतिभिलाषी कामरेड कन्हैया, यह क्रांति नही, तुम्हारे मन की भ्रान्ति है.


क्रांतिभिलाषी कामरेड कन्हैया, 
क्या करें क्रांतिभिलाषीलिखना पड़ेगा न ? मज़बूरी है. क्रांति की इतनी बड़ी अभिलाषा जो है तुममे. मानता हूँ तुम्हारा क्रांतिकारी भाषण सुनने में थोड़ी विलंब हो गयी. माफ़ करना, ‘भाषणनही तुम्हारा क्रांतिकारी अनुभव’. परन्तु, तुम्ही उसे कहीं पर अनुभवकहते हो, और कहीं पर भाषण’. जेल से लौटने के तुरंत बाद जेएनयू में दिए गए अपने शुद्ध बनावटी भाषण को तुमने अनुभवबताया और NDTV के रविश कुमार को दिए अपने साक्षात्कार में उसी अनुभवको भाषण. हालांकि, चाहे वह जो भी हो, अनुभव या भाषण, था तो बहुते क्रांतिकारी-बहुते क्रांतिकारी’. का बतायें कि कितना क्रांतिकारी ? हालाँकि, मेरी ऐसी भाषा के कारन स्वयं को दिल्ली चुनाव के पूर्व वाला अरविन्द केजरीवाल और मुझे अपुण्य प्रसून वाजपेयी समझने की भूल मत करना. ऐसी कोई बात नही है. एकदम नही. कोई बराबरी नही है तुममे और केजरीवाल में कामरेड. दूर-दूर तक नही. तुम शुरू से ही केजरीवाल से दो कदम आगे दिख रहे हो. इसका जीता-जागता प्रमाण है कि तुमने मिलने के लिए उन्हें घंटे भर का इंतज़ार तक करवा डाला. इतने कम समय में इतनी तरक्की ? वाह कामरेड ! वाह !! केजरीवाल महोदय ने ट्वीट कर तुम्हारे भाषण की प्रशंसा भी की थी. करनी भी चाहिए. किसी को भी अपने क्षेत्र के अपने से ज्यादा योग्य आदमी की अवश्य ही प्रशंसा करनी चाहिए.
तुम्हारी वह दिल्ली पुलिस के एक सिपाही के साथ बातचीत वाली और जेल में तुम्हे मिली लाल और नीलेकटोरे वाली कहानियाँ सुनकर तो मुझे पक्का यकीन ही हो गया कि बात बनाना तो तुम्हे बिलकुल भी नही आता है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से केजरीवाल महोदय को बिलकुल नही आता. ऐसी सत्य-आधारित कहानियां हम पहले से ही उनसे सुनते आ रहे हैं. कभी उन्हें कोई रिक्शावाला मिल जाता है, तो कभी कोई ऑटोवाला, और कभी तुम्हारी तरह कोई पुलिसवाला भी जो उन्हें चुपके से बताता है, कि कैसे वह आलाधिकारियों के दबाव की वज़ह से चाह कर भी ईमानदारी से काम नही कर पा रहा . प्रधानमंत्री कार्यालय तक में उनके गुप्तचर मौजूद हैं जो उन्हें समय-समय पर बताते रहते हैं कि कैसे प्रधानमंत्री दिन-रात उनके खिलाफ षड़यंत्र में जुटे रहते हैं, और यही प्रधानमंत्री कार्यालय का काम भी है. तो कामरेड, तुम्हारी कहानियां भी उन्ही की कहानियों की तरह बिलकुल सत्य घटनाओं पर आधारित प्रतीत होती हैं. तुमने यह भी कहा कि 'जब तक जेल में चना रहेगा तब-तक आना-जाना बना रहेगा'. तो एक बात इधर से भी कान खोल कर सुन लो कामरेड कि 'जब तक जेएनयू में देशद्रोह बना रहेगा, हमारा-तुम्हारा ठना रहेगा'. हाँ, एक बात और, वह तुम्हारी लाल और नीलेकटोरी वाली कहानी सुनकर मुझे भी एक बार तिहाड़ घूम कर आने का मन करने लगा है. देखना चाहता हूँ लाल और नीलीकटोरियाँ होती कैसी हैं, आज तक अपने जीवन में मैंने ऐसे रंग की कटोरियाँ नही देखी.
चलो, अब थोड़ी तुम्हारी क्रांतिपर आते हैं. तुमने कहा जेएनयू का विद्रोह स्पोनटेनीयसथा और यह भी कहा कि बदलाव ही सत्य है और इसी स्पोनटेनीयस विद्रोहको तुम अपने भाषण में क्रांतिका नाम दे रहे थे और मुमकीन है कि ऐसे ही स्पोनटेनीयस क्रांतिके सहारे तुम बदलाव का सपना भी देख रहे होगे. मुझे हंसी आती है तुम्हारी क्रांतिके भ्रांतिपूर्ण समझ पर. क्रांतिऔर स्पोनटेनीयस’? कहाँ से सीखे हो बंधू ? चलो, जिनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में पढ़ते हो और पता नही कब तक पढोगे, उनके ही विचार के बारे में बताता हूँ कि क्रांति और बदलावके बारे में उनकी क्या समझ थी. राष्ट्रकवि दिनकरकी अनुपम कृतियों में से एक, (जिनकी एक कृति कुरुक्षेत्रकी एक पंक्ति तुमने भी अपने भाषण के दौरान उधृत की थी, जिस पर मैं बाद में आऊंगा) संस्कृति के चार अध्यायकी प्रस्तावनालिखते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरु ने 30 सितम्बर 1955 को, ‘क्रांति और बदलावके सम्बन्ध में अपने विचार इस प्रकार रखे थे. उन्होंने कहा था
असल में, हमारा ध्यान उन्ही परिवर्तनों पर जाता है, जो हिंसक क्रांतियों या भूकंप के रूप में अचानक फट पड़ते हैं. फिर भी, प्रत्येक भूगर्भ-शास्त्री यह जानता है कि धरती की सतह में जो बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं, उनकी चाल बहुत धीमी होती है और भूकंप से होनेवाले परिवर्तन उनकी तुलना में अत्यंत तुच्छ समझे जाते हैं. इसी तरह, क्रांतियाँ भी धीरे-धीरे होने वाले परिवर्तन और सूक्ष्म-रूपांतरण की बहुत लम्बी प्रक्रिया का बाहरी प्रमाण मात्र होती हैं. इतिहास में कभी-कभी ऐसा भी समय आता है जब परिवर्तन की प्रक्रिया और उसकी तेजी कुछ अधिक प्रत्यक्ष हो जाती है. लेकिन, साधारणतः, बाहर से उसकी गति दिखाई नहीं देती. परिवर्तन का बाहर रूप, प्रायः, निस्पंद ही दीखता है.
अब जरा स्वयं के स्पोनटेनीयस क्रांतिवाली समझ को ऊपर के विचारो से सम्बंधित कर देखना और सोचना, फिर पता चलेगा क्रांतिके बारे में तुम्हारी समझ की पहुँच कहाँ तक है. 
तुमने अपने भाषण में संविधान की बहुत बाते की. अच्छा लगा सुनकर, विशेषकर 'न्यायिक हत्या' वाली पोस्टर देखने के पश्चात, यह एक भ्रामक मगर सुखद अनुभव था. मेरा एक सुझाव है, राजनीती और नारेबाजी से समय मिले तो सबसे पहले जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय अधिनियम 1966’ को एक बार जरुर पढना क्योंकि तब तुम्हे पता चलेगा कि जेएनयू की स्थापना के पीछे का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और अखंडताहै, न कि भारत की बर्बादी और कश्मीर की आज़ादी.तुम जिस विश्वविद्यालय में पढ़ते हो, यदि उसके उद्देश्य पर ही खरा न उतर पाओ और उसकी ही रक्षा न कर सको, तो बाकी गरीबी और भ्रष्टाचार हटाने के उद्देश्य के बारे में तो सोचना भी उर्जा का अपव्यय है, सोचो ही मत, वही उत्तम होगा.
तुमने अपने भाषण में समानता-असमानता के ऊपर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकरद्वारा रचित उनकी अनुपम कृति कुरुक्षेत्रकी एक पंक्ति भी उधृत की, पर काश तुम भारत के एकता और अखंडता के बारे में भी उनके निम्नाकित विचार को पढ़ और समझ पाते, जिसे उन्होंने हिमालय का सन्देशकविता में निम्न रूप से व्यक्त किया है :-
भारत है संज्ञा विराग की, उज्ज्वल आत्मउदय की,
भारत है आभा मनुष्य की सबसे बड़ी विजय की,
भारत है भावना दाह जग-जीवन का हरने की,
भारत है कल्पना मनुष्य को राग्मुक्त करने की !
जहाँ कहीं एकता अखंडित जहाँ प्रेम का स्वर है,
देश-देश में खड़ा वहां भारत जीवित, भास्वर है !
तुमने मनु और मनुवाद को भी जी भर की गालियाँ दी. नारे लगा-लगा कर गालियाँ दी. परन्तु, जानते हो मनुऔर मनुपुत्रपर रामधारी सिंह दिनकरके विचार ? चलो, वह भी बता देता हूँ कि उन्होंने चाँद और कवीशीर्षक नामक अपनी कविता में इस विषय पर क्या कहा था
मनु नही, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी,
कल्पना की जीभ में भी धार होती है !
बाण ही होते विचारों के नही केवल, 
स्वपन के भी हाथ में तलवार होती है !!
मशहूर कथाकार 'शैवाल' ने अपनी आत्मकथा में माउंटेन मैन दशरथ मांझीके बारे में, लिखते हुए यह कहा है, जो दूसरी बार तुम्हारी स्पोनटेनीयस क्रांतिके कांसेप्ट को स्पष्ट करने में पूर्ण रूप से मदद कर सकेगा और तुम्हारा असली आइकॉन चुनने में भी, कि -
ये पहाडी रास्ता क्रांति का रास्ता प्रतित होता है क्योंकि समूह का प्रेम ही क्रांति है. तुम सोचते हो बोल देने से होता है प्रेम, मैं सोचता हूँ जो उदित हो रहा है तुम्हारे अन्दर उसे चढ़ने दो आसमान पर, चुप रहो और बोलो अपनी चुप्पी में, लड़ो पर प्रेम करो सारी सृष्टि से, सारे समुदाय से, प्रेम नही बोलता. क्रांति महज इतना नही है कि उठालो शस्त्र या बोल दो नारा, प्रेम करना सीखो जैसे ये श्वेत पुष्प जीना सीखता है रक्त के समुदाय के साथ मेरे भीतर.